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दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना । Deen dayal upadhyaya gram jyoti yojana (DDUGJY) in hindi

आजादी के 70 साल बाद भी हमारा देश जिन क्षेत्रों में पिछड़ा है, उसमें चिकित्सा, शिक्षा के बाद बिजली का ही नंबर आता है। देश में हजारों की संख्या में ऐसे गांव हैं जहां आज तक बिजली के दर्शन ही नहीं हुए हैं। बिजली किस चीज को कहते हैं, सुदूर इलाकों में लोगों को इसका पता तक नहीं है। इसी समस्या के समाधान के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ग्रामीण इलाकों तक बिजली पहुंचाने के लिए दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना की शुरुआत की।

Deen dayal upadhyaya gram jyoti yojana

पहले से चल रही राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना से जोड़ दिया गया है। यह योजना जनसंघ के संस्थापक सदस्य पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर शुरू की गई है जिन्होंने एकात्म मानववाद का संदेश दिया था। उनकी मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में ट्रेन में हो गई थी। उनका शव मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर मिला था। उन्हीं की याद में मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया है।

क्यों पड़ी दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना की जरूरत

ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाने के लिए योजनाएं तो पहले भी बहुत बनी हैं लेकिन जमीन पर नहीं उतर सकीं। भ्रष्टाचार और सही से मॉनिटरिंग न होने के कारण सरकार के पैसे तो बर्बाद हुए ही, गांव भी अंधेरे में ही डूबे रहे। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के पहले तक स्थिति को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता था।

ग्रामीण बिजली की हालत तो अच्छी थी नहीं,  जिन गांवों तक बिजली पहुंच गई थी, वहां की व्यवस्था भी काफी लचर थी। देश के महानगरों को छोड़ दिया जाए तो बाकी के क्षेत्र की हालत कुछ अच्छी नहीं थी। जिन गांवों तक बिजली पहुंच गई थी, वहां भी 20 घंटे तक की कटौती होती थी। बिजली सिर्फ सिंचाई के नाम पर ही उपलब्ध हो पाती थी, वह भी तीन से चार घंटे। एक तरफ शहरों में बिजली का लोड बढ़ रहा था तो गांवों में अकाल पड़ा था।

इसी असमानता को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्रामीण इलाकों के विद्युतीकरण के लिए योजना की शुरआत की। कमियां तो अब भी बहुत हैं लेकिन यह भी सच है कि गांवों को बिजली 2014 की तुलना में काफी ज्यादा मिल रही है। अंधेरे में डूबे 18000 गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है। अब हर घर को रोशन करने की दिशा में काम चल रहा है।

क्या होगा लाभ

सरकारें गांवों और गरीबों का नाम लेकर बनती हैं लेकिन सच यह भी है कि गांवों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। ग्रामीणों की जरूरत को पूरा करने की जगह उनको जाति का झुनझना पकड़ा दिया जाता है। इसीलिए तो आजादी के 70 साल बाद भी गांवों तक बिजली न पहुंचा पाना, कभी मुद्दा नहीं बना। लोग जात-पात में बंटे रहे और गांवों की कीमत पर शहरों का विकास होता रहा। पहली बार ग्रामीण इलाकों तक बिजली पहुंचाने के लिए गंभीरता से प्रयास शुरू हुए हैं।

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हाईटेंशन लाइनों को बिछाने का काम युद्धस्तर पर किया गया। नेटवर्क में सुधार के लिए सब ट्रांसमिशन केंद्रों का निर्माण भी शुरू हुआ। अब पहले की तुलना में बिजली वितरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया जा रहा है। इस योजना के तहत जिन गांवों में बिजली पहुंची है, वहां पर मीटर लगाकर कनेक्शन दिए जा रहे हैं। इससे लाइनलॉस में कमी आएगी, क्योंकि बिजली चोरी नही होगी। इस योजना पर 76 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसमें से 630 हजार करोड़ रुपये का खर्च केंद्र सरकार उठाएगी।

जब गांवों में बिजली पहुंच जाएगी तो सिंचाई की सुविधा बेहतर होगी। किसानों को पर्याप्त बिजली व पानी मिलेगा तो इसका असर उपज पर भी पड़ेगा। उपज बढ़ेगी तो किसानों की आमदगी बढ़ेगी और देश में खाद्यान का भंडार बढ़ेगा। बिजली न होने के कारण ही हुनरमंद युवा गांवों को छोड़कर शहर की ओर आ जाते थे।

सिंचाई के लिए किसानों को डीजल के ट्यूबवेल चलाने पड़ते हैं। इससे खेती का खर्च कई गुना बढ़ जाता है और किसान कर्जे में डूब जाते हैं। कई बार तो खेती का खर्च भी निकालना मुश्किल हो जाता है। मजबूरी में किसान खेती छोड़कर मजदूरी करने लगते हैं। जब गांवों में बिजली होगी तो रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध होंगे। गांवों में मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध होंगे और संचार व्यवस्था पहले से ज्यादा बेहतर होगी।

गांवों में बिजली होगी तो बैंकिंग सेक्टर का विकास होगा। स्कूल, कॉलेजों में प्रोजेक्ट पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। अस्पतालों की हालत सुधरेगी और पुलिसिंग भी बेहतर होगी। सबसे बड़ी बात प्रतिभा का पलायन रुकेगा और युवा गांव के जीडीपी में ही योगदान देगा। इस वक्त शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ता जा रहा है। अगर गांवों में बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं व काम के अवसर मिलेंगे तो पलायन पर काफी हद तक रोक लगेगी। यह देश के साथ ही गांवों के लिए भी बहुत अच्छा होगा।

सब स्टेशन की संख्या बढ़ेगी, कम कटेगी बिजली

अब बिजली वितरण व्यवस्था को भी समझ लीजिए। इसे तीन हिस्सों में बांटा गया है। जेनरेशन, टांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन। जहां बिजली का उत्पादन होता है, वह जेनरेशन इकाई होती है। जेनरेशन इकाई हाइड्रो, थर्मल या न्यूक्लियर हो सकती है। यहां से उत्पन्न होने वाली बिजली सीधे ग्रिड पर भेजी जाती है, जिससे सभी राज्य जुड़े होते है। जैसे भारत में उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, मध्य समेत कई ग्रिड है। यहां से राज्य अपनी जरूरत या कोटे के हिसाब से बिजली लेते हैं।

इसके बाद बारी आती है ट्रांसमिशन की। टांसमिशन का मतलब कि ग्रिड से बिजली का अपना हिस्सा लेकर सब स्टेशन तक पहुंचाना। ग्रिड से बिजली हाई वोल्टेज में टॉवर्स के माध्यम से ट्रांसमिशन के 440 केवी सब स्टेशन तक पहुंचती है। यहां पर बड़े-बड़े ट्रांसफार्मर लगाकर 440 केवी की लाइन को 220 केवी में बदलता है। अब यहां से बिजली पहुंचती है दूसरे ट्रांसमिशन के सब स्टेशन पर। यहां पर बिजली को 132 केवी में बदला जाता है। यह ट्रांसमिशन की सबसे निचती इकाई होती है।

इसके बाद बारी आती है डिस्ट्रीब्यूशन के सब स्टेशन की। 132 केवी की बिजली को डिस्ट्रीब्यूशन के सब स्टेशन पर 33 केवी लाइन के माध्यम से पहुंचाया जाता है। इन सब स्टेशन पर बिजली को ट्रांसफार्मर के माध्यम से आपके घरों के पास तक 11 केवी लाइन के माध्यम से पहुंचाया जाता है जहां लगे होते हैं छोटे ट्रांसफार्मर जो बिजली को 220 वोल्ट में बदल देते हैं। यहां से बिजली आपके घरों तक पहुंचती है।

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत ट्रांसमिशन लाइनों का जाल फैलाया जा रहा है ताकि छोटे-छोटे फीडर के माध्यम से गांवों तक बिजली पहुंचाई जाए। फीडर जितने छोटे होंगे, उससे लाइन लॉस तो कम होगा ही, खराबी आने पर बहुत बड़े हिस्से की बिजली भी नहीं गुल होगी। मेंटेनेंस भी आसान होगा। क्योंकि डिस्ट्रीब्यूशन में कोई छोटी सी खराबी आने के कारण पूरा फीडर ठप होता है। फीडर जितना बड़ा होगा, उतने बड़े इलाके को बिजली का संकट झेलना होगा।

About Ashutosh Srivastava

हिंदी पत्रकारिता में 21 वर्ष का अनुभव। दैनिक जागरण और अमर उजाला में लंबा समय दिया।

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